बारिश में लखनऊ वाला प्यार |

Lucknow की बारिश में एक अलग ही तहज़ीब होती है।
यहाँ बारिश सिर्फ भीगाती नहीं… दिल को नरम भी कर देती है।

शाम का वक्त था।
हज़रतगंज की सड़कें हल्की बारिश से चमक रही थीं। दुकानों की रोशनियाँ पानी में टूटकर किसी पुराने सपने जैसी लग रही थीं।

आरिज़ सड़क किनारे चाय लेकर खड़ा था।
बारिश उसे हमेशा से पसंद थी।

क्योंकि बारिश में लोग थोड़े सच्चे लगते हैं।

तभी तेज हवा चली और पास खड़ी एक लड़की की छतरी उलट गई।

“ओह!” वो परेशान होकर उसे ठीक करने लगी।

आरिज़ खुद को रोक नहीं पाया।

“अगर इजाज़त हो… तो मदद कर दूँ?”

लड़की ने उसकी तरफ देखा।

हल्की काजल भरी आँखें… और चेहरे पर बारिश की बूंदें।

“शुक्रिया,” उसने मुस्कुराकर कहा।

“वैसे ये लखनऊ की बारिश है… यहाँ छतरी ज्यादा देर साथ नहीं देती।”

लड़की हँस पड़ी।

“और लोग?”

आरिज़ कुछ सेकंड उसे देखता रहा।

“वो किस्मत पर depend करता है।”

“दिलचस्प जवाब है।”

“लखनऊ वालों की बातें थोड़ी अदब वाली होती हैं।”

“अच्छा… तो आप लखनऊ वाले हैं?”

“दिल से।”

वो फिर मुस्कुराई।

“मैं ज़ोया हूँ।”

“आरिज़।”

बारिश अब और तेज हो चुकी थी।

“कॉफी?” आरिज़ ने पूछा।

ज़ोया ने आसमान की तरफ देखा और फिर उसकी तरफ।

“वैसे भी घर पहुँचने से पहले पूरी भीग जाऊँगी… तो क्यों नहीं?”

दोनों पास के कैफ़े में आ गए।

अंदर धीमी ग़ज़ल चल रही थी।
कॉफी की खुशबू और बाहर बारिश की आवाज़ पूरे माहौल को बेहद खूबसूरत बना रही थी।

“तुम पहली बार लखनऊ आई हो?” आरिज़ ने पूछा।

“हाँ। जॉब के लिए।”

“फिर तो सावधान रहना पड़ेगा।”

“क्यों?”

“ये शहर लोगों को अपना बना लेता है।”

ज़ोया हल्का सा मुस्कुराई।

“और लोग?”

आरिज़ ने कॉफी का कप उठाया।

“कुछ लोग दिल।”

दोनों हँस पड़े।

उस शाम के बाद बारिश उनका बहाना बन गई।

कभी टुंडे कबाबी के पास शाम की चाय, कभी गोमती नदी किनारे लंबी बातें, कभी बस हज़रतगंज की सड़कों पर बिना मंज़िल घूमना

ज़ोया धीरे-धीरे लखनऊ को महसूस करने लगी थी।

उसे इस शहर की तहज़ीब पसंद आने लगी थी…
और शायद आरिज़ भी।

एक रात दोनों गोमती रिवरफ्रंट पर बैठे थे। हल्की बारिश हो रही थी।

“तुम इतने अच्छे क्यों हो?” ज़ोया ने अचानक पूछा।

आरिज़ हँस पड़ा।

“अच्छा हूँ या तुम्हें पसंद आ गया हूँ?”

ज़ोया चुप हो गई।

बारिश की बूंदें पानी पर गिरकर छोटे-छोटे गोल घेरे बना रही थीं।

“शायद दोनों,” उसने धीरे से कहा।

उस पल दोनों के बीच खामोशी थी… लेकिन दिल बहुत कुछ बोल रहे थे।

धीरे-धीरे दोनों की दुनिया एक-दूसरे के आसपास सिमटने लगी।

सुबह का पहला मैसेज… रात की आखिरी कॉल… अचानक मिलने की जिद… और बारिश में भीगने के बहाने।

लेकिन हर खूबसूरत कहानी की तरह उनकी कहानी में भी एक मोड़ आया।

ज़ोया को दुबई में बड़ी नौकरी का ऑफर मिला।

उसका सपना।

लेकिन उस सपने के साथ एक डर भी था —
क्या वो लखनऊ… और आरिज़… दोनों छोड़ पाएगी?

उस रात दोनों फिर हज़रतगंज के उसी कैफ़े में बैठे थे जहाँ पहली बार मिले थे।

बाहर बारिश बहुत तेज हो रही थी।

“तुम जाओगी?” आरिज़ ने धीमे से पूछा।

ज़ोया की आँखें भर आईं।

“अगर गई… तो शायद सब बदल जाएगा।”

“और अगर नहीं गई?”

“तो शायद मैं खुद बदल जाऊँगी।”

कुछ देर दोनों चुप रहे।

क्योंकि जिंदगी कभी-कभी ऐसे सवाल पूछती है… जिनके जवाब दिल और दिमाग अलग-अलग देते हैं।

अगले दिन ज़ोया एयरपोर्ट के लिए निकल गई।

लेकिन रास्ते में अचानक बारिश शुरू हो गई।

वैसी ही बारिश… जैसी पहली मुलाकात वाले दिन हुई थी।

ज़ोया खिड़की से बाहर देखते हुए मुस्कुराई।

फिर अचानक ड्राइवर से बोली —

“गाड़ी वापस मोड़ दीजिए।”

“मैडम?”

“हज़रतगंज चलिए।”

करीब आधे घंटे बाद वो उसी सड़क पर खड़ी थी।

पूरा शहर बारिश में भीग रहा था।

और सामने… आरिज़।

वो अब भी वहीं खड़ा था।

जैसे उसे यकीन था कि ज़ोया लौटेगी।

ज़ोया उसके पास आई।

“तुम गए नहीं?”

आरिज़ हल्का सा मुस्कुराया।

“लखनऊ वाले मोहब्बत में थोड़ा इंतजार करना जानते हैं।”

ज़ोया की आँखों से आँसू निकल पड़े।

“मैं नहीं जा पाई…”

आरिज़ ने धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया।

“अच्छा किया।
क्योंकि कुछ प्यार बारिश की तरह होते हैं…
उन्हें महसूस किया जाता है, छोड़ा नहीं जाता।”

उस रात लखनऊ फिर भीग रहा था

लेकिन इस बार सिर्फ मौसम नहीं…
दो दिल भी प्यार में भीग रहे थे।

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